Tuesday, May 21, 2013

हे वीर युवाओं ............


सिंहसावक का जबड़ा फाड़कर उसकी दातों की गणना करने वाले,
वीर बालक भरत की वीरता बताने आया हूँ,
विश्व क्षितिज पर भारतीयता का डंका बजाने आया हूँ |
हे वीर युवाओं भारत में फिर से अलख जगाने आया हूँ ||

वेदों का ज्ञान, गीता का मर्म,
रामायण का प्यार और महाभारत का शौर्य बताने आया हूँ |
हे वीर युवाओं भारत में फिर से अलख जगाने आया हूँ ||

राष्ट्र हीत में जियो, राष्ट्र हीत में धर्म करो,
राष्ट्र सर्वोपरी है यही गीता और महाभारत का सार है,
राष्ट्र की रक्षा का फिर से तैयारी करने आया हूँ |
हे वीर युवाओं भारत में फिर से अलख जगाने आया हूँ ||

करो तुम कद्र हरेक मजहब का यह सिखाने आया हूँ,
जाती का ना तुम भेद करो यह बताने आया हूँ,
नारी पुजनिये है यह समझाने आया हूँ |
हे वीर युवाओं भारत में फिर से अलख जगाने आया हूँ ||

मजदूर किसान है देश की शान यह बताने आया हूँ,
जयजयकार करो तुम जवानों का यह समझाने आया हूँ,
सम्मान करो तुम विज्ञान का यह सिखाने आया हूँ |
हे वीर युवाओं भारत में फिर से अलख जगाने आया हूँ ||

भ्रष्ट्र सरकार के भ्रष्ट्र मंत्रियों का पोल खोलने आया हूँ,
बिके हुए अख़बारों का मोल बताने आया हूँ,
मुझे राग दरवारी नहीं आती इसलिए ......
हे वीर युवाओं भारत में फिर से अलख जगाने आया हूँ ||

अन्याय सहकर बैठ जाना महा दुष्कर्म है,
समस्या से मुहँ छिपाना अधर्म है,
अगर आप समस्या के समाधान का हिस्सा नहीं तो आप भी इक समस्या हो
यह समझाने आया हूँ |
हे वीर युवाओं भारत में फिर से अलख जगाने आया हूँ ||

गाँधी,सुभाष,तिलक,आजाद,भगत और पटेल के कर्म दोहराने आया हूँ,
भारत को खुशहाल बनाने के लिए फिर से क्रांती की बीज बोने आया हूँ |
हे वीर युवाओं भारत में फिर से अलख जगाने आया हूँ ||
हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब
यह विश्वाश दिलाने आया हूँ |
हे वीर युवाओं भारत में फिर से अलख जगाने आया हूँ ||







Saturday, March 23, 2013

23 मार्च 1931 "बलिदान दिवस"


आज 23 मार्च शहीद ऐ आजम भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु के बलिदान दिवस के अवसर पर कृतज्ञ राष्ट्र की भाव भीनी श्रधांजलि तथा युवा सलाम |
इस महान क्रांतिकारियों के लिए दो शब्द—
आपने दिया देश को जीवन, यह देश आपको क्या देगा ??
मगर गर्म रखने को लहू यह नाम आपका लेगा ||

साथियों यूँ तो  इस देश के क्रान्तिकारियों की लम्बी सूची हैं. उनकी संख्या भी कम नहीं है जो फांसी पर चढ़े, किन्तु भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु का बलिदान के उपरांत भारत में क्रांति की लहर इतनी तेज हो गयी थी  अंग्रेजों के नीव हिल गए थे
सशस्त्र क्रान्ति द्वारा देश को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराने का प्रयास करना चाहिए यह विचार 1857 की सैनिक क्रान्ति के बाद से ही उभरने लगा था और देश के विभिन्न भागों में उसकी सक्रियता भी प्रारंभ हो गई थी. 
स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रयत्नों की  प्रेरणा में धर्म-भावना का प्रभाव भी बहुत व्यापक था. बंगाल के क्रान्तिकारी हाथ में गीता लेकर फांसी पर झूल जाते थे. देश में आया नवजागरण हिन्दू नवजागरण, मुस्लिम नवजागरण और सिख नवजागरण के रूप में उभरा था. लेकिन भगत सिंह इनसे भिन्न किन्तु भगत सिंह संसार के विभिन्न भागों  में होने वाली क्रान्तियों से पूरी तरह परिचित होना चाहते थे और अपने सभी प्रयासों को उसी तरह ढालना चाहते थे. फ्रांस की राजक्रान्ति और रूस की बोल्शेविक क्रान्ति ने उन्हें बहुत प्रभावित और रोमांचित किया था. मार्क्‍स और लेनिन की  पुस्तकों को वह बड़े मनोयोग से पढ़ते थे.
साथियों भगत सिंह इक व्यक्ति नहीं विचार थे उनका इक प्रिये शायरी जो वो हमेशा दोहराते रहते थेहमें यह फ़िक्र है हरदम तर्ज़-ए-ज़फ़ा (अन्याय) क्या है

     हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है
     दहर (दुनिया) से क्यों ख़फ़ा रहें,
     चर्ख (आसमान) से क्यों ग़िला करें
     सारा जहां अदु (दुश्मन) सही, आओ मुक़ाबला करें ।


 एकवार इंकलाब को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा था  .इंकलाब जिंदाबाद से हमारा अर्थ है कभी पराजय स्वीकार न करने वाली वह भावना, जिसने जतिन दास जैसे शहीद पैदा किए. हमारी इच्छा है कि हम यह नारा बुलन्द करते समय अपने आदर्शो की भावना को जिंदा रखें. इंकलाब सिर्फ बम और पिस्तौल के साथ ही नहीं जुड़ा होगा. बम और पिस्तौल तो कभी-कभी इंकलाब के भिन्न-भिन्न रूपों की पुष्टि के लिए साधन मात्र हैं. हम यह स्वीकार करते हैं कि केवल बगावत को इंकलाब कहना ठीक नहीं है हम देश में बेहतर परिवर्तन के लिए इस शब्द का प्रयोग कर रहे हैं. , हम अपना नारा कारखानों में काम करने वाले लाखों मजदूरों, खेतों में काम करने वाले लाखों किसानों, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले असंख्य गरीबों के पास ले जाना चाहते हैं. इंकलाब का संदेश ऐसी आजादी लाएगा जिसमें आदमी के हाथों आदमी की लूट असंभव हो जाएगी.
भगत सिंह के विचारों के कारण उस समय की क्रान्तिकारी लहर को धर्मनिरपेक्ष रूप प्राप्त हुआ |


भगत सिंह प्राय: कहते थे- आजादी तो हमें मिल ही जाएगी किन्तु हमें इस पर भी विचार करना चाहिए कि आजाद भारत में हम किस प्रकार के समाज का निर्माण करेंगे. कहीं गोरे साहबों के स्थान पर काले साहब तो आकर हमारे सिरों पर नहीं बैठ जाएंगे. रूसी क्रान्ति के बाद सारे संसार में समाजवाद की चर्चा प्रारंभ हो गई थी. किसानों-मजदूरों के हितों की चिंता, सर्वहारा वर्ग में उभरती क्रान्ति चेतना को देश के नौजवानों में फैलाने के लिए भगत सिंह और उनके साथियों ने नौजवान भारत सभा की स्थापना की. भगत सिंह का कहना था कि हम इस देश में समाजवादी गणतंत्र की स्थापना चाहते हैं |

Wednesday, February 13, 2013

“कब तक उलझे रहोगे भारतवासियों” ‘मंदिर,मसजिद और गिरजाघरों में’



भारत के इतिहास का उल्लेख करने की कोई आवश्कता नहीं है | इतिहास सिख लेकर किये गए गलतियों में सुधार करने के लिए पड़ी जाती है | हमारे देश के इतिहास में कुछ मीठे, कुछ खट्टे, कुछ तीखे यादें हैं आज जरूरत है उससे जो कुछ मीठे हो उसे निकाल कर वाकी को वहीँ दफन कर देने का लेकिन दुर्भाग्यवस ऐसा होता नहीं दिख रहा है आज जो कुछ हो रहा है वह  दुर्भाग्यपुर्ण ही नहीं हास्यास्पद भी है | धर्म-जात की राजनीती करने वाले कुछ नेताओं ने इतिहास के गरे मुर्दे को निकालकर जिसतरह से दुर्गन्ध फैला रहे हैं उससे भारतीय समाज टूट कर बिखर रहा है | 
एक बार के लिए चलो मान भी लिया जाये कि 1528 में मीर बांकी/बाबर  अयोध्या आया और उसने मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनवाई...तो क्या बुद्ध मठों को तोड़कर या परिवर्तित कर मंदिर बनाए गए...तो क्या ?

आज 2013  के इस वैज्ञानिक युग में इन बातों का कोई औचित्य नहीं है | दुनियां कहाँ से कहाँ जा रही है और हम आज भी मंदिर और मस्ज्जिद  में उलझे हैं | गौर करने वाली बात यह है की जिस देश में गरीबों को रहने के लिए घर नहीं है, जिस देश में पढ़ने के लिए इक बहुत बड़ी आवादी को स्कूल नसीब नहीं है, जिस देश में वेरोजगार युवाओं का इक लम्बी फ़ौज खड़ी हो, वह देश आज भी मंदिर और मसजिद बनाने और तोड़ने में उलझा रहे तो यह हमारी बदनसीबी के सिवा कुछ नहीं हो सकती है | हे शियासत करने वालों मुझे और न उलझाओ मंदिर,मसजिद और गिरजाघरों में, हम युवाओं को ना मंदिर चाहिए ना मज्जिद, मुझे तो बस पुस्तकालय, स्कूल,कॉलेज और रोजगार चाहिए | हे देश के युवा साथियों  शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित रहो...तभी देश चहुं तरफा विकास कर पाएगा |



क्या होगा मस्जीद में नमाज अदा कर,

क्या होगा जो गुरुद्वारे में जा के मथ्था टेंकुं,
क्या होगा जो गंगा में मैं सिक्के फेंकूं,

क्या होगा जो चर्च में जाकर करू प्रेयर,
क्या होगा रामायण और गीता रटकर,

क्या होगा जो करूँ में गुरु ग्रन्थ साहिब का पाठ,
क्या होगा जो कुरआन के रट्टे मारूँ सात आठ,

बाईबिल को पढ़ कर क्या होगा,
राम और रहीम को जानकर क्या होगा,

क्या होगा ये सब कर के,
क्या होगा इंसानियत को तज के,

मैं इंसान हूँ, मुझे सियासत नहीं आती,
आदमी को आदमी से बांटे वो धर्म नहीं भाती.



“आखिर हम क्यों बाटे जाते हैं धर्म के नाम पर, जाती के नाम पर”



जब हमारा देश गुलाम था हमारे अन्दर अपनी आजादी की ललक थी | हमारे अन्दर देशभक्ति कूट-कूट कर भरी थी लेकिन हम जैसे ही आजाद हुए हमें धर्म के नाम पर दो देश में बाट दिया गया और तभी से हमारा देशभक्ति का लव बुझने लगा और धर्म के नाम पर हमारी लड़ाई बढ़ने लगी | देश की जगह धर्म हमारी पहचान बन गयी, हम कभी-कभी धर्म को सबसे ऊपर समझने की भूल कर बैठे जिसके परिणामस्वरूप आजादी के बाध हमें कई दंगे झेलने पड़े | आजादी के वाद जिन नेताओं ने सरकार चलाने का जिम्मा लिया वो सभी के सभी स्वतंत्रता सेनानी थे उनके अन्दर देशभक्ति कुछ हद तक थी लेकिन ज्यो ज्यो वह पीढ़ी ख़तम हुयी हमारी धार्मिक चरमपंथी, इन नेताओं के लिए राजनीतिक मुद्दा बनने लगा इसके वाद तो धर्म को भी बाट कर जाती को मुद्दा बनाया जाने लगा | हम या तो धर्म के नाम पर वोट देने लगे या जाती के नाम पर या फिर वोट ही नहीं देते हैं आज भी हालत नहीं बदला है और यही कारण है की अगर कोई कोशिश भी करे तो विकाश मुद्दा नहीं बनता है क्योकि हमारे अन्दर इक भावना भर दिया गया की चुनाव नेता नहीं जीतता जाती और धर्म जीतती है | ऐसा माहोल बनाया गया है इस देश के लोग वास्तविकता से अपरिचित रहे क्योकि विकास पसंद जनता सवाल पूछती है और सरकार से हिसाब मांगती है | साथियों पिछले साल से इस देश के युवाओं में जागरूकता आया है | हमें फिर से अपने अन्दर वही आजादी वाला जूनून लाना होगा और नयी आजादी की लड़ाई काले अंग्रेजों से ही लड़ना होगा | हमने गोरों की गुलामी से आजादी पा लिया लेकिन कुछ काले नेताओं की पैसे की भूख ने हमें विवश किया फिर से नयी आजादी के लिए | साथियों  आगे बड़े और अपने अन्दर वही देशप्रेम के साथ नयी आजादी की शुरुआत करें | हमारी इक ही पहचान है भारत यही हमारी जाती यही हमारा धर्म है | हम अपने आप में इक भारत हैं जिस दिन इस भावना के साथ हमलोग जुड़ जायेंगे उस दिन भारत विश्व गुरु बन जायेगा |
दबने का वक़्त ख़तम हुआ ,
अब उठने का वक़्त है ,
गुस्से को पिने का वक़्त ख़तम हुआ ,
अब लड़ने का वक़्त है ,
एक जगह पर ठहरे हुए 64 साल बीत गए ,
अब चलने का वक़्त है ,
वक़्त किसी के लिए नहीं ठहरता ,
अगर अब भी उनसे ही उम्मीद किये बैठे रहे ,
तो समझो मरने का वक़्त है , जय भारत |
आंदोलन देशप्रेम, संपर्क करें – अमित सिंह +91-8822363984

Sunday, December 9, 2012

असम में चार साल (पहल भाग "सांस्कृतिक यात्रा" )







बीत गयी सो बात गयी लेकिन यादें, यादें विवश करती है बीते हुए समय से कुछ सिखने और जो कुछ सिख पाया उसे लोगों तक पहुचाने  की, अपनी जिन्दगी के चार महत्वपूर्ण  साल असम में बिता कर मैं अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता हूँ । बीते चार सालों में, मैं इस प्रदेश को जितने करीब से देखा और इसे समझा उसका संक्षिप्त वर्णन करने की मेरी छोटी सी कोशिश ।
भारत के पूर्वोत्तर भाग में हिमालय और ब्रहमपुत्र के सौंदर्य से महिमामंडित विस्तृत भूभाग में फैला विभिन्नताओं का प्रदेश,असम है ! एतिहासिक कल में इसे कामरूप के नाम से जाना जाता था । असम का शाब्दिक अर्थ होता है जिसके समान दूसरा न हो - प्रकृती, संस्कृति  और सभ्यता में सही मायने में भारत में ऐशा कोई दूसरा प्रदेश नहीं है । नारी समानता, जाती समानता और दहेज़ प्रथा जैसे कुरीतियों के क्षेत्र में असम आज शेष भारत के लिए अनुकर्नीये है ।
विभिन्न प्रजातियों से बने यहाँ के समाज में वह सौमनस्य देखा जाता है जिसे भारत के परिवेश में आदर्श कहा जायेगा । असम मानव प्रजातियों  का एतिहासिक मिलन स्थल रहा है- मंगोलियाई ,थाई, काकेशी, वर्मी और आस्ट्रेलियाई आदी प्रजातियाँ यहाँ शदियों से मिलन भाव से रह रही है । इस मेल जोल ने असम के सामाजिक जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित किया फलतः यहाँ एक ऐसी  जीवन शैली का विकाश हुआ जिसपर सम्पूर्ण भारत नाज कर सकता है। इस शैली ने यहाँ के सांस्कृतिक जीवन को एक अलग पहचान दी ।

यहाँ की सांस्कृतिक जीवन को आज भी प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है । जापी (बास के बने गोल टोपे जिसके किनारी इक रंगे  से मडी होती है तथा जिसपे सलमें सितारे लगे होते हैं ) अतिथियों के सम्मान के लिए उनके सर पर पहनाया जाता है । असम अपनी शिल्पकारिता के लिए पुरे देश में जाना जाता है । यहाँ की धातु शिल्प सदियों से अपनी गुणवत्ता के लिए जाना जाता है । आज भी इन बर्तनों में खाना खिलाना यहाँ के लोग अपना शान समझते हैं । पान जिसे असमिया भाषा में तामोल कहते हैं इसे खाना और खिलाना यहाँ शिष्टाचार  का एक अंग है ।


असम के सांस्कृतिक प्रतीकों में सिर्फ शिल्प के नमूने ही नहीं प्रकृति के साथ झूमना और गाना भी शामिल है । असमियाँ कलेंडर का पहला मास है बहाग(वैशाख )  इसी मास यहाँ वसंत का शुभागमन होता है । असम का सबसे बड़ा उत्सव रंगाली  बिहू  इसी मास में मनाया जाता है । मौशम के गरमाते ही इस अंचल के वृक्ष रंग विरंगे फूलों से खिल उठते हैं । प्रकृति के संग यहाँ के लोग भी झुमने गाने लगते हैं । रंगाली  बिहू जो खुले मैदान में आयोजित होती है इसमें युवकों- युवतियों  का समूह परंपरागत  वाद्यंत्र के साथ पुरे जोश में कमोदीप्पक नृत्य बिहू में भाग लेते जो यहाँ की संस्कृती  में चार चाँद लगाती  है ।
 इसी प्रकार माघ महीने में जब किसान फसल काटकर कर घर लौटता है तो भोगाली बिहू मनाया जाता है खाने के विभिन्न पारंपरिक व्यंजनों से भरपूर यह बिहू और भी मनमोहक हो जाता है । खाने में पीठा , नारियल का लाडू प्रमुख रूप से बनाया जाता है |




असम की सांस्कृतिक यात्रा तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक हम यहाँ के लोगों का प्रेमोपहार गमोसा (गमछा ) की चर्चा नहीं कर लेते । प्राचीन समय से ही असम में हथकरघे पर कपड़ा बुना जाता रहा है । महात्मा गाँधी ने असम यात्रा के दौरान यहाँ की कन्याओं को कपड़ा बुनते हुए देखा था और बडे प्रभावित होकर उन्होंने कहा असमियाँ कन्या करघे पर स्वप्न बुनती है । गमछा यहाँ अपने से बड़ों को अपनी क्ष्रधा के प्रतीक स्वरुप भेट किया जाता है ।

कला के क्षेत्र में असम प्राचीन समय से ही जाना जाता है । विश्व की पहली महिला चित्रकार चित्रलेखा तेजपुर की रहने वाली थी । यहाँ की पारम्परीक जनजातियों में कला का गुण आज भी है ।घर घर में कलात्मक वस्त्र निर्माण और चित्रांकन यहाँ की दैनिक क्रिया है ।
इसका जीता जगता उदहारण हमें दिसम्बर 2011 को गुवाहाटी के सुर्सजई स्टेडियम में देखने को मिला जहाँ बच्चों ने मिलकर 1100 मीटर लम्बी चित्र बनाकर एक कृतिमान बनाया ।


लोक संस्कृती  के समृधि के हिसाब से असम बहुत धनी प्रदेश है । किसी संदर्भ में अगर यहाँ परंपराओं का शासन है तो किसी मामले में स्थानीय शिल्प तो कहीं लोककलाओं को अग्रता मिली है । आमतौर पर सभी सांस्कृतिक इकाइयों में बसे  प्रतीक पाए जाते हैं जिनसे उन इकाइयों को विशिस्ट सांस्कृतिक पहचान मिलती है पर जिस गंभीरता के साथ असमियाँ समाज अपने सांस्कृतिक प्रतीकों से जुड़ा है वह अन्य समाज के लिए अनुकरणीय  है  यह प्रतिक ही हैं जिनसे आज का असम अपने आप को अभिव्यक्त कर पाता है ।

अनेक प्रकार के नाकारात्मक आन्दोलन के बावजूद असम आज यदि जागृत है तो इसमें संदेह नहीं की यह जागृति बहुत हद तक इन सांस्कृतिक प्रतीकों के कारण ही है ।